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Chapter- 6. मानचित्र अध्ययन: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

मानचित्र अध्ययन: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. हैश्यूर से आप क्या समझते हैं? इसका प्रयोग किस काम के लिए किया जाता है ?

हैश्यूर एक प्रकार की रेखा है जिसका प्रयोग मानचित्रों पर ऊंचाई या ढलान को दर्शाने के लिए किया जाता है। यह रेखाएँ एक-दूसरे के समानांतर होती हैं और उनकी दिशा उच्च से निम्न की ओर होती है। हैश्यूर की मोटाई और घनत्व ऊंचाई के अनुपात में होता है। मोटी और घनी हैश्यूर रेखाएँ अधिक ऊंची भूमि को दर्शाती हैं, जबकि पतली और विरल हैश्यूर रेखाएँ कम ऊंची भूमि को दर्शाती हैं।

हैश्यूर का प्रयोग मानचित्रों पर निम्नलिखित कार्यों के लिए किया जाता है:

  • ऊंचाई या ढलान को दर्शाना
  • पहाड़ों, घाटियों और अन्य स्थलाकृतियों की रूपरेखा को दर्शाना
  • मानचित्र को अधिक सुगम और समझने में आसान बनाना

हैश्यूर का प्रयोग विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में किया जाता है, जिसमें भौगोलिक मानचित्र, भूवैज्ञानिक मानचित्र, और सैन्य मानचित्र शामिल हैं।

हैश्यूर को बनाने के लिए दो मुख्य विधियाँ हैं:

  • सामान्य विधि: इस विधि में, हैश्यूर रेखाओं को मानचित्र पर हाथ से बनाया जाता है।
  • कंप्यूटर विधि: इस विधि में, हैश्यूर रेखाओं को कंप्यूटर प्रोग्राम का उपयोग करके बनाया जाता है।

हैश्यूर एक महत्वपूर्ण मानचित्रकारी तकनीक है जो मानचित्रों को अधिक सूचनात्मक और उपयोगी बनाती है।

2. समोच्च रेखाओं द्वारा विभिन्न प्रकार की स्थलाकृति का प्रदर्शन करें।

समोच्च रेखाएँ उन सभी बिंदुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाएँ होती हैं जिनकी ऊँचाई समान होती है। मानचित्रों पर, समोच्च रेखाएँ समान ऊँचाई वाले बिंदुओं को जोड़ती हैं और स्थलाकृति की रूपरेखा को दर्शाती हैं।

समोच्च रेखाओं द्वारा विभिन्न प्रकार की स्थलाकृति को दर्शाने के लिए निम्नलिखित उदाहरण दिए गए हैं:

  • पहाड़: समोच्च रेखाएँ पहाड़ों की ऊँचाई और ढलान को दर्शाती हैं। पास-पास की समोच्च रेखाएँ खड़ी ढलान को दर्शाती हैं, जबकि दूर-दूर की समोच्च रेखाएँ ढलान को दर्शाती हैं।

  • घाटी: समोच्च रेखाएँ घाटियों की आकृति और ढलान को दर्शाती हैं। V-आकार की घाटियाँ खड़ी ढलान वाली होती हैं, जबकि U-आकार की घाटियाँ धीरे-धीरे ढलान वाली होती हैं।

  • मरुस्थल: समोच्च रेखाएँ मरुस्थलों की समतल सतह को दर्शाती हैं। समोच्च रेखाएँ समान रूप से दूर-दूर होती हैं, जो मरुस्थल की चपटी सतह को दर्शाती हैं।

  • वन: समोच्च रेखाएँ वनों की ऊँचाई और ढलान को दर्शाती हैं। ढलान वाले क्षेत्रों में, समोच्च रेखाएँ एक-दूसरे के करीब होती हैं, जबकि समतल क्षेत्रों में, समोच्च रेखाएँ एक-दूसरे से दूर होती हैं।

  • समुद्र तट: समोच्च रेखाएँ समुद्र तट की ऊँचाई और ढलान को दर्शाती हैं। पानी के पास की समोच्च रेखाएँ पास-पास होती हैं, जबकि पानी से दूर की समोच्च रेखाएँ दूर-दूर होती हैं।

समोच्च रेखाएँ एक शक्तिशाली मानचित्रकारी उपकरण हैं जो स्थलाकृति की रूपरेखा को दर्शाने में मदद करती हैं।

3. स्तर-रंजन अथवा रंग विधि का प्रयोग स्थलाकृतियों को दर्शाने ।में किस प्रकार किया जाता है ? समझायें।

स्तर-रंजन अथवा रंग विधि एक मानचित्रण तकनीक है जिसका उपयोग स्थलाकृति को दर्शाने के लिए किया जाता है। इस विधि में, मानचित्र पर विभिन्न रंगों का उपयोग करके ऊंचाई के विभिन्न स्तरों को दर्शाया जाता है।

स्तर-रंजन विधि का उपयोग विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में किया जाता है, जिसमें भौगोलिक मानचित्र, भूवैज्ञानिक मानचित्र, और सैन्य मानचित्र शामिल हैं।

स्तर-रंजन विधि का उपयोग करने के लिए, सबसे पहले मानचित्र पर ऊंचाई के विभिन्न स्तरों को परिभाषित किया जाता है। आमतौर पर, प्रत्येक स्तर में 200 मीटर या 500 मीटर की ऊंचाई होती है।

एक बार ऊंचाई के स्तरों को परिभाषित करने के बाद, प्रत्येक स्तर को एक अलग रंग से जोड़ा जाता है। ऊंचाई के उच्च स्तरों के लिए आमतौर पर हल्के रंगों का उपयोग किया जाता है, जबकि ऊंचाई के निम्न स्तरों के लिए आमतौर पर गहरे रंगों का उपयोग किया जाता है।

उदाहरण के लिए, मानचित्र पर 0 से 200 मीटर की ऊंचाई के लिए हरे रंग का उपयोग किया जा सकता है, 200 से 400 मीटर की ऊंचाई के लिए पीले रंग का उपयोग किया जा सकता है, और 400 से 600 मीटर की ऊंचाई के लिए भूरे रंग का उपयोग किया जा सकता है।

स्तर-रंजन विधि का उपयोग करके, स्थलाकृति की रूपरेखा को एक स्पष्ट और सुगम तरीके से दर्शाया जा सकता है। इस विधि का उपयोग करके, उपयोगकर्ता ऊंचाई और ढलान को आसानी से समझ सकते हैं।

स्तर-रंजन विधि के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं:

  • यह स्थलाकृति की रूपरेखा को स्पष्ट और सुगम तरीके से दर्शाता है।
  • यह ऊंचाई और ढलान को आसानी से समझने में मदद करता है।
  • यह विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में उपयोग किया जा सकता है।

स्तर-रंजन विधि के कुछ नुकसान निम्नलिखित हैं:

  • यह अधिक जटिल हो सकती है।
  • यह समोच्च रेखाओं की तुलना में कम सटीक हो सकती है।

4. उच्चावच-प्रदर्शन की प्रमुख विधियों का उल्लेख कीजिए ।

उच्चावच-प्रदर्शन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं:

  • समोच्च रेखा विधि: यह उच्चावच-प्रदर्शन की सबसे आम विधि है। इस विधि में, मानचित्र पर समान ऊँचाई वाले बिंदुओं को मिलाकर रेखाएं खींची जाती हैं। ये रेखाएं समोच्च रेखाएँ कहलाती हैं। समोच्च रेखाओं की मोटाई और घनत्व ऊँचाई के अनुपात में होता है। मोटी और घनी समोच्च रेखाएँ अधिक ऊंची भूमि को दर्शाती हैं, जबकि पतली और विरल समोच्च रेखाएँ कम ऊंची भूमि को दर्शाती हैं।

  • हैश्यूर विधि: इस विधि में, मानचित्र पर ऊँचाई के अनुसार रेखाओं की दिशा और घनत्व को बदला जाता है। मोटी और घनी रेखाएँ अधिक ऊंची भूमि को दर्शाती हैं, जबकि पतली और विरल रेखाएँ कम ऊंची भूमि को दर्शाती हैं।

  • पर्वतीय छाया विधि: इस विधि में, मानचित्र पर ऊँचाई के आधार पर छाया डाली जाती है। ऊँची भूमि पर अधिक छाया पड़ती है, जबकि नीची भूमि पर कम छाया पड़ती है।

  • रूपरेखा विधि: इस विधि में, मानचित्र पर ऊँचाई के अनुसार रेखाओं की आकृति को बदला जाता है। मोटी और घनी रेखाएँ अधिक ऊंची भूमि को दर्शाती हैं, जबकि पतली और विरल रेखाएँ कम ऊंची भूमि को दर्शाती हैं।

  • स्थानिक ऊँचाई विधि: इस विधि में, मानचित्र पर ऊँचाई के अनुसार बिंदुओं को चिह्नित किया जाता है।

इन विधियों में से प्रत्येक की अपनी-अपनी विशेषताएँ और उपयोगिता हैं। समोच्च रेखा विधि सबसे सटीक विधि है, लेकिन यह अधिक जटिल भी हो सकती है। हैश्यूर विधि अधिक सरल है, लेकिन यह उतनी सटीक नहीं है। पर्वतीय छाया विधि और रूपरेखा विधि अधिक कलात्मक होती हैं, लेकिन ये उतनी सटीक नहीं हैं। स्थानीय ऊँचाई विधि सबसे सरल है, लेकिन यह उतनी जानकारीपूर्ण नहीं है।

उच्चावच-प्रदर्शन की विधि का चयन मानचित्र के उद्देश्य और उपयोगकर्ता की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है।

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