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Chapter- 6. मानचित्र अध्ययन: लघु उत्तरीय प्रश्न

1. उच्चावच निरूपण किसे कहते हैं ?

उच्चावच निरूपण एक मानचित्रण तकनीक है जिसका उपयोग स्थलाकृति, या पृथ्वी की सतह के रूप और ऊंचाई, को दर्शाने के लिए किया जाता है। उच्चावच निरूपण के कई तरीके हैं, जिनमें समोच्च रेखा विधि, हैश्यूर विधि, और पर्वतीय छाया विधि शामिल हैं।

समोच्च रेखा विधि सबसे आम उच्चावच निरूपण विधि है। इस विधि में, मानचित्र पर समान ऊंचाई वाले बिंदुओं को मिलाकर रेखाएं खींची जाती हैं। ये रेखाएं समोच्च रेखाएँ कहलाती हैं। समोच्च रेखाओं की मोटाई और घनत्व ऊंचाई के अनुपात में होता है। मोटी और घनी समोच्च रेखाएँ अधिक ऊंची भूमि को दर्शाती हैं, जबकि पतली और विरल समोच्च रेखाएँ कम ऊंची भूमि को दर्शाती हैं।

हैश्यूर विधि एक अन्य उच्चावच निरूपण विधि है। इस विधि में, मानचित्र पर ऊंचाई के अनुसार रेखाओं की दिशा और घनत्व को बदला जाता है। मोटी और घनी रेखाएँ अधिक ऊंची भूमि को दर्शाती हैं, जबकि पतली और विरल रेखाएँ कम ऊंची भूमि को दर्शाती हैं।

पर्वतीय छाया विधि एक ऐसी उच्चावच निरूपण विधि है जिसमें मानचित्र पर ऊंचाई के आधार पर छाया डाली जाती है। ऊँची भूमि पर अधिक छाया पड़ती है, जबकि नीची भूमि पर कम छाया पड़ती है।

उच्चावच निरूपण का उपयोग विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में किया जाता है, जिनमें भौगोलिक मानचित्र, भूवैज्ञानिक मानचित्र, और सैन्य मानचित्र शामिल हैं।

2. स्थानिक ऊँचाई (Spot Height) किसे कहा जाता है ?

स्थानिक ऊँचाई (Spot Height) एक प्रकार की ऊँचाई है जिसे एक विशेष बिंदु की ऊँचाई के रूप में मापा जाता है। यह ऊँचाई समुद्र तल से मापी जाती है।

स्थानिक ऊँचाई का उपयोग विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में किया जाता है, जिनमें भौगोलिक मानचित्र, भूवैज्ञानिक मानचित्र, और सैन्य मानचित्र शामिल हैं।

स्थानिक ऊँचाई को मापने के लिए विभिन्न विधियों का उपयोग किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं:

  • त्रिकोणमिति: इस विधि में, एक बिंदु की ऊँचाई को अन्य दो बिंदुओं से उसकी दूरी और उन बिंदुओं से उस बिंदु तक के कोण को मापकर निर्धारित किया जाता है।
  • समुद्र तल से ऊँचाई: इस विधि में, एक बिंदु की ऊँचाई को एक उपकरण का उपयोग करके निर्धारित किया जाता है जो समुद्र तल से उसकी ऊँचाई को मापता है।
  • GPS: इस विधि में, एक बिंदु की ऊँचाई को एक GPS उपकरण का उपयोग करके निर्धारित किया जाता है जो उस बिंदु की समुद्र तल से ऊँचाई को मापता है।

स्थानिक ऊँचाई का उपयोग विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं:

  • स्थलाकृति का अध्ययन: स्थानिक ऊँचाई का उपयोग स्थलाकृति, या पृथ्वी की सतह के रूप और ऊंचाई, का अध्ययन करने के लिए किया जा सकता है।
  • नाविक मार्गदर्शन: स्थानिक ऊँचाई का उपयोग नाविकों द्वारा मार्गदर्शन करने के लिए किया जा सकता है।
  • सैन्य योजना: स्थानिक ऊँचाई का उपयोग सैन्य योजना के लिए किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, एक भौगोलिक मानचित्र पर, स्थानिक ऊँचाई को आमतौर पर एक बिंदु के बगल में एक संख्या के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। यह संख्या उस बिंदु की ऊँचाई को समुद्र तल से मीटर में दर्शाती है।

स्थानिक ऊँचाई एक महत्वपूर्ण मानचित्रकारी अवधारणा है जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

3. तल चिह्न क्या है ?

तल चिह्न एक मानचित्र पर एक विशेष बिंदु की ऊँचाई को दर्शाने वाला एक चिह्न है। यह चिह्न आमतौर पर एक बिंदु के बगल में एक संख्या के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। यह संख्या उस बिंदु की ऊँचाई को समुद्र तल से मीटर में दर्शाती है।

तल चिह्न का उपयोग विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में किया जाता है, जिनमें भौगोलिक मानचित्र, भूवैज्ञानिक मानचित्र, और सैन्य मानचित्र शामिल हैं।

तल चिह्न का उपयोग विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं:

  • स्थलाकृति का अध्ययन: तल चिह्न का उपयोग स्थलाकृति, या पृथ्वी की सतह के रूप और ऊंचाई, का अध्ययन करने के लिए किया जा सकता है।
  • नाविक मार्गदर्शन: तल चिह्न का उपयोग नाविकों द्वारा मार्गदर्शन करने के लिए किया जा सकता है।
  • सैन्य योजना: तल चिह्न का उपयोग सैन्य योजना के लिए किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, एक भौगोलिक मानचित्र पर, तल चिह्न को आमतौर पर एक बिंदु के बगल में एक संख्या के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। यह संख्या उस बिंदु की ऊँचाई को समुद्र तल से मीटर में दर्शाती है।

तल चिह्न एक महत्वपूर्ण मानचित्रकारी अवधारणा है जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

तल चिह्न के प्रकार

तल चिह्न के दो मुख्य प्रकार हैं:

  • स्थानिक तल चिह्न: यह तल चिह्न किसी विशेष बिंदु की ऊँचाई को दर्शाता है।
  • समान ऊँचाई तल चिह्न: यह तल चिह्न किसी विशेष ऊँचाई वाले क्षेत्र को दर्शाता है।

स्थानिक तल चिह्न आमतौर पर एक बिंदु के बगल में एक संख्या के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। समान ऊँचाई तल चिह्न आमतौर पर एक रेखा के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

समान ऊँचाई तल चिह्न का उपयोग स्थलाकृति की रूपरेखा को दर्शाने के लिए किया जाता है।

4. स्तर रंजन या रंग विधि क्या है ?

स्तर रंजन या रंग विधि एक मानचित्रण तकनीक है जिसका उपयोग स्थलाकृति, या पृथ्वी की सतह के रूप और ऊंचाई, को दर्शाने के लिए किया जाता है। इस विधि में, मानचित्र पर विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों को विभिन्न रंगों से दर्शाया जाता है।

स्तर रंजन विधि का उपयोग विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में किया जाता है, जिनमें भौगोलिक मानचित्र, भूवैज्ञानिक मानचित्र, और सैन्य मानचित्र शामिल हैं।

स्तर रंजन विधि का उपयोग करने के लिए, सबसे पहले मानचित्र पर ऊंचाई के विभिन्न स्तरों को परिभाषित किया जाता है। आमतौर पर, प्रत्येक स्तर में 200 मीटर या 500 मीटर की ऊंचाई होती है।

एक बार ऊंचाई के स्तरों को परिभाषित करने के बाद, प्रत्येक स्तर को एक अलग रंग से जोड़ा जाता है। ऊंचाई के उच्च स्तरों के लिए आमतौर पर हल्के रंगों का उपयोग किया जाता है, जबकि ऊंचाई के निम्न स्तरों के लिए आमतौर पर गहरे रंगों का उपयोग किया जाता है।

उदाहरण के लिए, मानचित्र पर 0 से 200 मीटर की ऊंचाई के लिए हरे रंग का उपयोग किया जा सकता है, 200 से 400 मीटर की ऊंचाई के लिए पीले रंग का उपयोग किया जा सकता है, और 400 से 600 मीटर की ऊंचाई के लिए भूरे रंग का उपयोग किया जा सकता है।

स्तर रंजन विधि का उपयोग करके, स्थलाकृति की रूपरेखा को एक स्पष्ट और सुगम तरीके से दर्शाया जा सकता है। इस विधि का उपयोग करके, उपयोगकर्ता ऊंचाई और ढलान को आसानी से समझ सकते हैं।

स्तर रंजन विधि के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं:

  • यह स्थलाकृति की रूपरेखा को स्पष्ट और सुगम तरीके से दर्शाता है।
  • यह ऊंचाई और ढलान को आसानी से समझने में मदद करता है।
  • यह विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में उपयोग किया जा सकता है।

स्तर रंजन विधि के कुछ नुकसान निम्नलिखित हैं:

  • यह अधिक जटिल हो सकती है।
  • यह समोच्च रेखाओं की तुलना में कम सटीक हो सकती है।

5. समोच्च रेखा से आप क्या समझते हैं ?

समोच्च रेखा एक प्रकार की रेखा है जो मानचित्र पर समान ऊंचाई वाले बिंदुओं को मिलाती है। समोच्च रेखाओं का उपयोग स्थलाकृति, या पृथ्वी की सतह के रूप और ऊंचाई, को दर्शाने के लिए किया जाता है।

समोच्च रेखाओं की कुछ विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • समोच्च रेखाओं का आकार वक्र होता है।
  • समोच्च रेखाएँ एक-दूसरे को कभी नहीं काटती हैं।
  • समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी ऊंचाई के अंतर के बराबर होती है।

उदाहरण के लिए, मानचित्र पर 100 मीटर की ऊंचाई वाले सभी बिंदुओं को मिलाकर एक समोच्च रेखा बनाई जाती है। 200 मीटर की ऊंचाई वाले सभी बिंदुओं को मिलाकर एक दूसरी समोच्च रेखा बनाई जाती है। इस प्रकार, समोच्च रेखाएँ ऊंचाई के विभिन्न स्तरों को दर्शाती हैं।

समोच्च रेखाओं का उपयोग विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं:

  • स्थलाकृति का अध्ययन: समोच्च रेखाओं का उपयोग स्थलाकृति, या पृथ्वी की सतह के रूप और ऊंचाई, का अध्ययन करने के लिए किया जा सकता है।
  • नाविक मार्गदर्शन: समोच्च रेखाओं का उपयोग नाविकों द्वारा मार्गदर्शन करने के लिए किया जा सकता है।
  • सैन्य योजना: समोच्च रेखाओं का उपयोग सैन्य योजना के लिए किया जा सकता है।

समोच्च रेखाओं का उपयोग करके, स्थलाकृति की रूपरेखा को एक स्पष्ट और सुगम तरीके से दर्शाया जा सकता है। इस विधि का उपयोग करके, उपयोगकर्ता ऊंचाई और ढलान को आसानी से समझ सकते हैं।

समोच्च रेखाओं के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं:

  • यह स्थलाकृति की रूपरेखा को स्पष्ट और सुगम तरीके से दर्शाता है।
  • यह ऊंचाई और ढलान को समझने में मदद करता है।
  • यह एक मानचित्र पर विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों को दर्शाने का एक प्रभावी तरीका है।

समोच्च रेखाओं के कुछ नुकसान निम्नलिखित हैं:

  • यह अधिक जटिल हो सकती है।
  • यह स्तर रंजन की तुलना में कम आकर्षक हो सकती है।

6. समोच्च रेखाओं द्वारा शंक्वाकार पहाड़ी का प्रदर्शन किस प्रकार किया जाता है ?

समोच्च रेखाओं द्वारा शंक्वाकार पहाड़ी का प्रदर्शन इस प्रकार किया जाता है:

  • मानचित्र पर, शंक्वाकार पहाड़ी के आधार को एक बंद वृत्त के रूप में दर्शाया जाता है।
  • पहाड़ी की ऊंचाई के अनुसार, समोच्च रेखाओं को वृत्त के अंदर खींचा जाता है।
  • समोच्च रेखाओं की घनत्व पहाड़ी की ढलान को दर्शाती है।

उदाहरण के लिए, मानचित्र पर एक शंक्वाकार पहाड़ी का आधार 100 मीटर की त्रिज्या वाला एक वृत्त है। यदि पहाड़ी की ऊंचाई 500 मीटर है, तो मानचित्र पर 100 मीटर की ऊंचाई वाली समोच्च रेखा वृत्त के केंद्र से 400 मीटर की दूरी पर खींची जाएगी। 200 मीटर की ऊंचाई वाली समोच्च रेखा वृत्त के केंद्र से 300 मीटर की दूरी पर खींची जाएगी, और इसी तरह।

इस प्रकार, समोच्च रेखाओं द्वारा शंक्वाकार पहाड़ी के आधार, ऊंचाई, और ढलान को स्पष्ट रूप से दर्शाया जा सकता है।

यहां कुछ विशेष बातें ध्यान देने योग्य हैं:

  • शंक्वाकार पहाड़ी की ढलान सबसे अधिक उसके शीर्ष पर होती है।
  • समोच्च रेखाएँ शीर्ष पर सबसे घनी होती हैं, और आधार पर सबसे विरल होती हैं।

समोच्च रेखाओं का उपयोग करके, उपयोगकर्ता शंक्वाकार पहाड़ी की ऊंचाई, ढलान, और आकार का आसानी से अनुमान लगा सकते हैं।

7. पठारों को किस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है ?

पठारों को समोच्च रेखाओं द्वारा इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है:

  • पठार के किनारों पर समोच्च रेखाएँ पास-पास होती हैं।
  • जैसे-जैसे पठार के भीतर की ओर बढ़ते हैं, समोच्च रेखाएँ दूर-दूर होती जाती हैं।

इसका कारण यह है कि पठारों के किनारे आमतौर पर खड़े होते हैं, जबकि उनके भीतर की ओर ढलान धीमी होती है।

उदाहरण के लिए, मानचित्र पर एक पठार के किनारे पर 100 मीटर की ऊंचाई वाली समोच्च रेखाएँ 50 मीटर की दूरी पर खींची जाती हैं। 200 मीटर की ऊंचाई वाली समोच्च रेखाएँ 100 मीटर की दूरी पर खींची जाती हैं, और इसी तरह।

इस प्रकार, समोच्च रेखाओं द्वारा पठार के किनारों, ऊंचाई, और ढलान को स्पष्ट रूप से दर्शाया जा सकता है।

यहां कुछ विशेष बातें ध्यान देने योग्य हैं:

  • पठार के किनारों पर ढलान सबसे अधिक होती है।
  • समोच्च रेखाएँ किनारों पर सबसे घनी होती हैं, और भीतर की ओर सबसे विरल होती हैं।

समोच्च रेखाओं का उपयोग करके, उपयोगकर्ता पठार की ऊंचाई, ढलान, और आकार का आसानी से अनुमान लगा सकते हैं।

पठारों को प्रदर्शित करने के लिए अन्य तरीकों में स्तर रंजन और हैश्यूर विधि शामिल हैं। हालांकि, समोच्च रेखा विधि पठारों को प्रदर्शित करने का सबसे आम और प्रभावी तरीका है।

8. पर्वतीय छायाकरण विधि का वर्णन करें।

पर्वतीय छायाकरण विधि एक मानचित्रण तकनीक है जिसका उपयोग स्थलाकृति, या पृथ्वी की सतह के रूप और ऊंचाई, को दर्शाने के लिए किया जाता है। इस विधि में, मानचित्र पर भू-आकृतियों के ऊपर से प्रकाश पड़ने की कल्पना की जाती है और अंधेरे में पड़ने वाले भाग को गहरे छायांकन से भर दिया जाता है और प्रकाश वाले भाग को हल्के छायांकन से भर दिया जाता है या फिर खाली छोड़ दिया जाता है।

पर्वतीय छायाकरण विधि का उपयोग विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में किया जाता है, जिनमें भौगोलिक मानचित्र, भूवैज्ञानिक मानचित्र, और सैन्य मानचित्र शामिल हैं।

पर्वतीय छायाकरण विधि का उपयोग करने के लिए, सबसे पहले मानचित्र पर प्रकाश की दिशा को परिभाषित किया जाता है। आमतौर पर, प्रकाश उत्तर-पश्चिम से आता माना जाता है।

एक बार प्रकाश की दिशा को परिभाषित करने के बाद, मानचित्र पर भू-आकृतियों को गहरे और हल्के छाया के दो समूहों में विभाजित किया जाता है।

गहरे छाया के क्षेत्र वे हैं जो प्रकाश से ढके हुए हैं। ये क्षेत्र आमतौर पर ऊंचे भू-आकृतियों पर पाए जाते हैं।

हल्के छाया के क्षेत्र वे हैं जो प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। ये क्षेत्र आमतौर पर निचले भू-आकृतियों पर पाए जाते हैं।

इस प्रकार, पर्वतीय छायाकरण विधि का उपयोग करके, स्थलाकृति की रूपरेखा को एक स्पष्ट और सुगम तरीके से दर्शाया जा सकता है। इस विधि का उपयोग करके, उपयोगकर्ता ऊंचाई और ढलान को आसानी से समझ सकते हैं।

पर्वतीय छायाकरण विधि के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं:

  • यह स्थलाकृति की रूपरेखा को स्पष्ट और सुगम तरीके से दर्शाता है।
  • यह ऊंचाई और ढलान को समझने में मदद करता है।
  • यह विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में उपयोग किया जा सकता है।

पर्वतीय छायाकरण विधि के कुछ नुकसान निम्नलिखित हैं:

  • यह अधिक जटिल हो सकती है।
  • यह समोच्च रेखाओं की तुलना में कम सटीक हो सकती है।

पर्वतीय छायाकरण विधि और समोच्च रेखा विधि दोनों का उपयोग स्थलाकृति को दर्शाने के लिए किया जाता है। हालांकि, दोनों विधियों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं।

पर्वतीय छायाकरण विधि एक अधिक कलात्मक विधि है जो स्थलाकृति की रूपरेखा को एक अधिक आकर्षक और वास्तविक तरीके से दर्शाती है। समोच्च रेखा विधि एक अधिक सटीक विधि है जो ऊंचाई और ढलान को अधिक सटीक रूप से दर्शाती है।

किसी विशेष अनुप्रयोग के लिए कौन सी विधि बेहतर है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि स्थलाकृति का प्रतिनिधित्व किस तरह से किया जाना है।

9. निम्नलिखित को किस रंग से दिखाया जाता है ? बतावें-

मानचित्र पर निम्नलिखित को निम्नलिखित रंगों से दिखाया जाता है:

  • समुद्र: नीला
  • नदियों और झीलों: नीला
  • पहाड़: भूरा, हरा, या काला
  • पठार: भूरा या हरा
  • घाटियाँ: हरा
  • रेगिस्तान: भूरा या पीला
  • वन: हरा
  • मरुस्थल: भूरा या पीला
  • बस्तियाँ: लाल या नारंगी
  • सड़कें: काली
  • रेलवे लाइनें: लाल
  • हवाई अड्डे: नारंगी

इन रंगों का उपयोग मानचित्र पर विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियों और सुविधाओं को दर्शाने के लिए किया जाता है। यह उपयोगकर्ताओं को मानचित्र को समझने और उसमें जानकारी खोजने में मदद करता है।

यहां कुछ विशिष्ट उदाहरण दिए गए हैं:

  • समुद्र: मानचित्र पर समुद्र को आमतौर पर नीले रंग से दिखाया जाता है। यह इसलिए है क्योंकि समुद्र का रंग आमतौर पर नीला होता है।
  • नदियों और झीलों: नदियों और झीलों को भी आमतौर पर नीले रंग से दिखाया जाता है। हालांकि, नदियों को अक्सर मोटे नीले रंग से दिखाया जाता है ताकि उन्हें झीलों से अलग किया जा सके।
  • पहाड़: पहाड़ों को आमतौर पर भूरे, हरे, या काले रंग से दिखाया जाता है। भूरे रंग का उपयोग आमतौर पर ऊंचे पहाड़ों के लिए किया जाता है, जबकि हरे रंग का उपयोग आमतौर पर कम ऊंचे पहाड़ों के लिए किया जाता है। काले रंग का उपयोग कभी-कभी खड़ी चट्टानों या अन्य कठोर भू-आकृतियों के लिए किया जाता है।
  • पठार: पठारों को आमतौर पर भूरे या हरे रंग से दिखाया जाता है। भूरे रंग का उपयोग आमतौर पर ऊंचे पठारों के लिए किया जाता है, जबकि हरे रंग का उपयोग आमतौर पर कम ऊंचे पठारों के लिए किया जाता है।
  • घाटियाँ: घाटियों को आमतौर पर हरे रंग से दिखाया जाता है।
  • रेगिस्तान: रेगिस्तानों को आमतौर पर भूरे या पीले रंग से दिखाया जाता है। भूरे रंग का उपयोग आमतौर पर चट्टानी रेगिस्तानों के लिए किया जाता है, जबकि पीले रंग का उपयोग आमतौर पर रेतीले रेगिस्तानों के लिए किया जाता है।
  • वन: वनों को आमतौर पर हरे रंग से दिखाया जाता है।
  • मरुस्थल: मरुस्थलों को आमतौर पर भूरे या पीले रंग से दिखाया जाता है।
  • बस्तियाँ: बस्तियों को आमतौर पर लाल या नारंगी रंग से दिखाया जाता है।
  • सड़कें: सड़कों को आमतौर पर काली रंग से दिखाया जाता है।
  • रेलवे लाइनें: रेलवे लाइनों को आमतौर पर लाल रंग से दिखाया जाता है।
  • हवाई अड्डे: हवाई अड्डों को आमतौर पर नारंगी रंग से दिखाया जाता है।

मानचित्र पर उपयोग किए जाने वाले रंगों को मानचित्र के उद्देश्य के आधार पर भी बदला जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक सैन्य मानचित्र पर, पहाड़ों को आमतौर पर भूरे रंग से दिखाया जाता है, जबकि एक पर्यटन मानचित्र पर, पहाड़ों को आमतौर पर हरे रंग से दिखाया जाता है।

10. लेहमान कौन थे ?

लेहमान एक जर्मन वैज्ञानिक थे जिन्होंने मानचित्रण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जन्म 1711 में जर्मनी के लीपज़िग में हुआ था। उन्होंने गणित और भौतिकी का अध्ययन किया और 1737 में लीपज़िग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने।

लेहमान ने मानचित्रण के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए, जिनमें शामिल हैं:

  • उन्होंने समोच्च रेखाओं की अवधारणा विकसित की, जो आज भी मानचित्रों पर ऊंचाई को दर्शाने के लिए उपयोग की जाती है।
  • उन्होंने मानचित्रों पर ढलान को दर्शाने के लिए एक विधि विकसित की, जिसे “लेहमान हाइड्रोग्राफ” कहा जाता है।
  • उन्होंने मानचित्रों पर जलवायु को दर्शाने के लिए एक विधि विकसित की, जिसे “लेहमान क्लाइमेटॉग्राफ” कहा जाता है।

लेहमान का मानचित्रण पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। उनकी तकनीकों का उपयोग आज भी मानचित्रों पर किया जाता है।

लेहमान की कुछ प्रमुख उपलब्धियां निम्नलिखित हैं:

  • समोच्च रेखाओं की अवधारणा: लेहमान ने समोच्च रेखाओं की अवधारणा विकसित की, जो आज भी मानचित्रों पर ऊंचाई को दर्शाने के लिए उपयोग की जाती है। समोच्च रेखाएँ समान ऊंचाई वाले बिंदुओं को मिलाती हैं।
  • लेहमान हाइड्रोग्राफ: लेहमान ने मानचित्रों पर ढलान को दर्शाने के लिए एक विधि विकसित की, जिसे “लेहमान हाइड्रोग्राफ” कहा जाता है। लेहमान हाइड्रोग्राफ एक रेखा है जो मानचित्र पर किसी बिंदु से उस बिंदु तक की ढलान को दर्शाती है।
  • लेहमान क्लाइमेटॉग्राफ: लेहमान ने मानचित्रों पर जलवायु को दर्शाने के लिए एक विधि विकसित की, जिसे “लेहमान क्लाइमेटॉग्राफ” कहा जाता है। लेहमान क्लाइमेटॉग्राफ एक मानचित्र है जो मानचित्र पर किसी क्षेत्र की जलवायु को दर्शाता है।

लेहमान की उपलब्धियों ने मानचित्रण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी तकनीकों का उपयोग आज भी मानचित्रों पर किया जाता है।

11. उच्चावच प्रदर्शन के लिए कौन-सी विधि श्रेष्ठ है ?

उच्चावच प्रदर्शन के लिए समोच्च रेखा विधि को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यह एक मानक विधि है जो उच्चावच को सबसे सटीक और प्रभावी तरीके से दर्शाती है।

समोच्च रेखाएँ समान ऊंचाई वाले बिंदुओं को मिलाती हैं। जब मानचित्र पर समोच्च रेखाएँ खींची जाती हैं, तो वे भू-आकृतियों की रूपरेखा और ढलान को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं।

समोच्च रेखा विधि के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं:

  • यह उच्चावच को सबसे सटीक तरीके से दर्शाता है।
  • यह ढलान को समझने में मदद करता है।
  • यह विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में उपयोग किया जा सकता है।

समोच्च रेखा विधि के कुछ नुकसान निम्नलिखित हैं:

  • यह जटिल हो सकता है।
  • यह मानचित्र को अधिक कठोर बना सकता है।

समोच्च रेखा विधि के अलावा, उच्चावच प्रदर्शन के लिए अन्य विधियों का भी उपयोग किया जाता है, जिनमें शामिल हैं:

  • पर्वतीय छायाकरण विधि: इस विधि में, मानचित्र पर भू-आकृतियों के ऊपर से प्रकाश पड़ने की कल्पना की जाती है और अंधेरे में पड़ने वाले भाग को गहरे छायांकन से भर दिया जाता है और प्रकाश वाले भाग को हल्के छायांकन से भर दिया जाता है। यह विधि स्थलाकृति की रूपरेखा को एक अधिक आकर्षक और वास्तविक तरीके से दर्शाती है।
  • स्तर रंजन विधि: इस विधि में, मानचित्र पर विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों को विभिन्न रंगों से भरा जाता है। यह विधि उच्चावच को एक अधिक सरल और समझने में आसान तरीके से दर्शाती है।

किसी विशेष अनुप्रयोग के लिए कौन सी विधि बेहतर है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उच्चावच का प्रतिनिधित्व किस तरह से किया जाना है। यदि उच्चावच को सटीक और प्रभावी तरीके से दर्शाना आवश्यक है, तो समोच्च रेखा विधि सबसे अच्छी विधि है। यदि उच्चावच को एक अधिक आकर्षक और वास्तविक तरीके से दर्शाना आवश्यक है, तो पर्वतीय छायाकरण विधि एक बेहतर विकल्प हो सकती है। यदि उच्चावच को एक अधिक सरल और समझने में आसान तरीके से दर्शाना आवश्यक है, तो स्तर रंजन विधि एक बेहतर विकल्प हो सकती है।

12. ‘v’ वी आकार की घाटी को किस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है ?

‘v’ आकार की घाटी को मानचित्र पर समोच्च रेखाओं के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार की घाटी में, समोच्च रेखाएँ आमतौर पर एक दूसरे के बहुत करीब होती हैं, और वे एक ‘v’ आकार बनाती हैं।

मानचित्र पर, ‘v’ आकार की घाटी के निचले भाग को सबसे भीतर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है तथा इसके दोनों किनारों के बीच का अंतर अधिक होता है। बाहर की ओर स्थित दूसरी समोच्च रेखाओं के लिए एकसमान अंतराल के साथ समोच्च रेखाओं का मान बढ़ता जाता है।

उदाहरण के लिए, मानचित्र पर एक ‘v’ आकार की घाटी का निचला भाग 100 मीटर की ऊंचाई वाली समोच्च रेखाओं के द्वारा दिखाया जाता है, जो पास-पास स्थित होती हैं तथा जिनके समोच्च का मान कम होता है। 200 मीटर की ऊंचाई वाली समोच्च रेखाएँ 50 मीटर की दूरी पर खींची जाती हैं, और इसी तरह।

इस प्रकार, समोच्च रेखाओं का उपयोग करके, ‘v’ आकार की घाटी के निचले भाग, ऊंचाई, और ढलान को स्पष्ट रूप से दर्शाया जा सकता है।

यहाँ कुछ विशेष बातें ध्यान देने योग्य हैं:

  • ‘v’ आकार की घाटी की ढलान सबसे अधिक उसके मुख पर होती है।
  • समोच्च रेखाएँ मुख पर सबसे घनी होती हैं, और आधार पर सबसे विरल होती हैं।

समोच्च रेखाओं का उपयोग करके, उपयोगकर्ता ‘v’ आकार की घाटी की ऊंचाई, ढलान, और आकार का आसानी से अनुमान लगा सकते हैं।

13. त्रिभुजन विधि क्या है ?

त्रिभुजन विधि एक सर्वेक्षण विधि है जिसका उपयोग किसी बिंदु की स्थिति ज्ञात करने के लिए किया जाता है। इस विधि में, एक आधार-रेखा के दोनों सिरों से उस बिंदु की दिशा में बनने वाले दो कोणों को मापकर ही कर लिया जाता है, न कि उस बिंदु की दूरी मापकर।

त्रिभुजन विधि का उपयोग विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षणों में किया जाता है, जिनमें शामिल हैं:

  • भू-आकृतिक सर्वेक्षण: इस प्रकार के सर्वेक्षण में, किसी क्षेत्र की स्थलाकृति को दर्शाने के लिए त्रिभुजन विधि का उपयोग किया जाता है।
  • जियोडेटिक सर्वेक्षण: इस प्रकार के सर्वेक्षण में, किसी क्षेत्र की त्रिज्या और आकृति को निर्धारित करने के लिए त्रिभुजन विधि का उपयोग किया जाता है।
  • सैन्य सर्वेक्षण: इस प्रकार के सर्वेक्षण में, किसी क्षेत्र की सैन्य महत्व की सुविधाओं को दर्शाने के लिए त्रिभुजन विधि का उपयोग किया जाता है।

त्रिभुजन विधि का उपयोग करने के लिए, सबसे पहले एक आधार-रेखा खींची जाती है। आधार-रेखा की लंबाई आमतौर पर 500 मीटर से 1000 मीटर तक होती है।

आधार-रेखा के दोनों सिरों पर, उस बिंदु की दिशा में दो कोण मापे जाते हैं। इन कोणों को थ्योडोलाइट या अन्य उपकरणों का उपयोग करके मापा जाता है।

मापे गए कोणों का उपयोग करके, उस बिंदु की स्थिति ज्ञात की जाती है।

त्रिभुजन विधि के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं:

  • यह एक सटीक विधि है।
  • यह एक लागत प्रभावी विधि है।
  • यह विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षणों में उपयोग किया जा सकता है।

त्रिभुजन विधि के कुछ नुकसान निम्नलिखित हैं:

  • यह एक जटिल विधि हो सकती है।
  • यह सीमित दृश्यता वाले क्षेत्रों में उपयोग नहीं की जा सकती है।

त्रिभुजन विधि एक महत्वपूर्ण सर्वेक्षण विधि है जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षणों में किया जाता है। यह एक सटीक और लागत प्रभावी विधि है जो विभिन्न प्रकार के क्षेत्रों में उपयोग की जा सकती है।

14. जल प्रपातों को किस प्रकार चित्रण किया जाता है ?

जल प्रपातों को चित्रित करने के लिए विभिन्न तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। इनमें शामिल हैं:

  • समोच्च रेखा विधि: इस विधि में, जल प्रपात के विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों को समोच्च रेखाओं के माध्यम से दर्शाया जाता है। समोच्च रेखाएँ जल प्रपात की ऊंचाई, ढलान, और आकार को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं।
  • पर्वतीय छायाकरण विधि: इस विधि में, जल प्रपात के ऊपर से प्रकाश पड़ने की कल्पना की जाती है और अंधेरे में पड़ने वाले भाग को गहरे छायांकन से भर दिया जाता है और प्रकाश वाले भाग को हल्के छायांकन से भर दिया जाता है। यह विधि जल प्रपात की रूपरेखा और गति को एक अधिक आकर्षक और वास्तविक तरीके से दर्शाती है।
  • स्तर रंजन विधि: इस विधि में, जल प्रपात के विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों को विभिन्न रंगों से भरा जाता है। यह विधि जल प्रपात को एक अधिक सरल और समझने में आसान तरीके से दर्शाती है।

जल प्रपातों को चित्रित करते समय, निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:

  • जल प्रपात की ऊंचाई और ढलान: जल प्रपात की ऊंचाई और ढलान को स्पष्ट रूप से दर्शाना महत्वपूर्ण है।
  • जल प्रपात की रूपरेखा: जल प्रपात की रूपरेखा को सटीक रूप से दर्शाना महत्वपूर्ण है।
  • जल प्रपात की गति: जल प्रपात की गति को दर्शाना महत्वपूर्ण है, खासकर यदि जल प्रपात में बहुत अधिक पानी बह रहा है।

यहाँ जल प्रपातों को चित्रित करने के लिए कुछ विशिष्ट सुझाव दिए गए हैं:

  • समोच्च रेखा विधि: समोच्च रेखाओं को खींचते समय, ध्यान रखें कि वे जल प्रपात की ऊंचाई और ढलान को सटीक रूप से दर्शाती हों।
  • पर्वतीय छायाकरण विधि: छायाकरण करते समय, ध्यान रखें कि यह जल प्रपात की रूपरेखा और गति को उजागर करे।
  • स्तर रंजन विधि: रंगों का चयन करते समय, ध्यान रखें कि वे जल प्रपात की ऊंचाई और ढलान को दर्शाते हों।

जल प्रपातों को चित्रित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो सकता है, लेकिन यह एक बहुत ही पुरस्कृत भी हो सकता है। अच्छी तरह से चित्रित किया गया जल प्रपात न केवल सुंदर दिखता है, बल्कि यह जल प्रपात की सुंदरता और शक्ति को भी दर्शाता है।

15. त्रिकोणमितीय स्टेशन क्या है ?

त्रिकोणमितीय स्टेशन वह स्थान है जहाँ से किसी क्षेत्र की स्थलाकृति या अन्य सुविधाओं को मापने के लिए त्रिकोणमितीय तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

त्रिकोणमितीय स्टेशनों को आमतौर पर ऊंचे स्थानों पर बनाया जाता है ताकि उनसे अधिक क्षेत्र का अवलोकन किया जा सके। इन स्टेशनों पर आमतौर पर थ्योडोलाइट, स्टेडियन, या अन्य उपकरण होते हैं जिनका उपयोग कोणों और दूरियों को मापने के लिए किया जाता है।

त्रिकोणमितीय स्टेशनों का उपयोग विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षणों में किया जाता है, जिनमें शामिल हैं:

  • भू-आकृतिक सर्वेक्षण: इस प्रकार के सर्वेक्षण में, किसी क्षेत्र की स्थलाकृति को दर्शाने के लिए त्रिकोणमितीय स्टेशनों का उपयोग किया जाता है।
  • जियोडेटिक सर्वेक्षण: इस प्रकार के सर्वेक्षण में, किसी क्षेत्र की त्रिज्या और आकृति को निर्धारित करने के लिए त्रिकोणमितीय स्टेशनों का उपयोग किया जाता है।
  • सैन्य सर्वेक्षण: इस प्रकार के सर्वेक्षण में, किसी क्षेत्र की सैन्य महत्व की सुविधाओं को दर्शाने के लिए त्रिकोणमितीय स्टेशनों का उपयोग किया जाता है।

त्रिकोणमितीय स्टेशनों के कुछ महत्वपूर्ण लाभ निम्नलिखित हैं:

  • यह एक सटीक विधि है।
  • यह एक लागत प्रभावी विधि है।
  • यह विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षणों में उपयोग किया जा सकता है।

त्रिकोणमितीय स्टेशन एक महत्वपूर्ण सर्वेक्षण उपकरण हैं जो विभिन्न प्रकार के कार्यों में उपयोग किए जाते हैं।

16. पृथ्वी पर भू-आकृति कितनी आकृति की होती है ?

पृथ्वी पर भू-आकृतियाँ विभिन्न प्रकार की आकृतियों में होती हैं। इनमें शामिल हैं:

  • पर्वत: पर्वत पृथ्वी की सबसे ऊँची भू-आकृतियाँ हैं। वे आमतौर पर ढलान वाली ढलानों, तीव्र चोटियों और घाटियों से बनी होती हैं।
  • पठार: पठार एक बड़ी, समतल या थोड़ी ऊँची भू-आकृति है। वे आमतौर पर पहाड़ों या अन्य ऊँची भू-आकृतियों से घिरे होते हैं।
  • मैदान: मैदान एक बड़ी, समतल भू-आकृति है। वे आमतौर पर पहाड़ों या अन्य ऊँची भू-आकृतियों से घिरे नहीं होते हैं।
  • घाटी: घाटी एक लंबी, संकरी भू-आकृति है जो दो पहाड़ों या अन्य ऊँची भू-आकृतियों के बीच स्थित होती है।
  • खड्ड: खड्ड एक गहरी, संकरी भू-आकृति है जो आमतौर पर नदी या अन्य जलधारा द्वारा बनती है।
  • अंजीर: अंजीर एक बड़ी, गोल भू-आकृति है जो आमतौर पर नदी या अन्य जलधारा द्वारा बनती है।
  • लैगून: लैगून एक छोटा, उथला जलाशय है जो आमतौर पर एक द्वीप या अन्य भूमि द्रव्यमान से घिरा होता है।
  • मरुस्थल: मरुस्थल एक सूखी, शुष्क भू-आकृति है जहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
  • टुंड्रा: टुंड्रा एक ठंडा, बर्फीला भू-आकृति है जहाँ बहुत कम पेड़ होते हैं।
  • वन: वन एक बड़ी, पेड़ों से घिरी भू-आकृति है।

इनके अलावा, पृथ्वी पर कई अन्य प्रकार की भू-आकृतियाँ भी हैं, जैसे कि ज्वालामुखी, गुफाएँ, और चट्टानें।

भू-आकृतियों की आकृति कई कारकों से प्रभावित होती है, जिनमें शामिल हैं:

  • भू-आकृति के निर्माण में शामिल बलों की प्रकृति: उदाहरण के लिए, हिमनदों द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ आमतौर पर गोल आकार की होती हैं, जबकि नदियों द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ आमतौर पर लंबी और संकरी होती हैं।
  • भू-आकृति के निर्माण में शामिल सामग्रियों की प्रकृति: उदाहरण के लिए, चट्टानों से बनी भू-आकृतियाँ आमतौर पर कठोर और टिकाऊ होती हैं, जबकि मिट्टी से बनी भू-आकृतियाँ आमतौर पर नरम और कम टिकाऊ होती हैं।
  • भू-आकृति के निर्माण के दौरान हुए क्षरण की मात्रा: क्षरण से भू-आकृतियों की आकृति बदल सकती है। उदाहरण के लिए, नदियों के किनारे की चट्टानें अक्सर क्षरण से गोल आकार की हो जाती हैं।

भू-आकृतियाँ पृथ्वी की सतह को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे जलवायु, पारिस्थितिकी और मानव गतिविधियों को प्रभावित करती हैं।

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